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मासिक पत्रिका (अलग सुनाऊं) Presenting By Alag Sunau

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  मासिक पत्रिका (अलग सुनाऊं) _______"मंदाकिनी"______ विशेष:- लेख, कविता, गज़ल, पैरोडी, प्रतिगीत, संगीत, कहानी, नाटक, एकांकी, यात्रा, संस्मरण, समीक्षा, भाषा-चर्चा, निबंध, विषय आलेख, समसामयिकी पर अपने संज्ञान भेज सकते हैं। महत्वपूर्ण (एक ही रचना स्वीकृत) अपनी रचना भेजें अलग सुनाऊ समूह से वॉट्सएप पर जुड़े। CLICK HERE Copyright Alag Sunau Team

Main Aaj Ki Kitab || Kuch Baat Technology Ki || Voice Of Book || Hindi ...

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Tasveer Aur Frame | A short story of life | Moral Stories Hindi

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Hindi Kavita | Written By:-prem_ki_pakhi (Neha Vats) #writers

  दिवाली पर हर साल आने वाली नयी लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्ति ले लेती है पुरानी मूर्ति की जगह और पुरानी मूर्तियाँ रख उठती हैं तुलसी के चौरे पर या पीपल के चबूतरों पर, जो विसर्जन की प्रतीक्षा में क्षण-प्रतिक्षण क्षीण होती रहती हैं। प्रेयसियाँ जिनका स्थान दे दिया जाता है किसी और को और वे ठीक इन्हीं मूर्तियों की तरह रख उठती हैं किसी अनजान के आँगन के चौरों पर जो जीवन भर कर्तव्य निर्वाहन के बीच, धीरे-धीरे क्षीण होती जाती हैं। कभी ना पूरी होने वाली एक प्रतीक्षा मन के ताखों में रखी किसी छोटी ढिभरी की तरह जलती रहती है। Written By:- prem_ki_pakhi (Neha Vats) Follow Us On Instagram:- NEHA VATS

Written by @snehal_a_wele | Hindi Kavita | Poetry | Youtube/Alag Sunau.

  खुद की मोहब्बत जताने के खातिर क्या सच में उस माली के बगीचे के गुलाबो की कुर्बानी देना जरूरी है?? दरअसल बात जताने में और नीभाने में उतना ही फरक है जीतना की ये बात समझने में, की मोहब्बत गर जताने से अच्छी वो कीसीने निभाई जाये तो बेहतर । ~स्नेहल

किसी किताब को यूँ ही ख़त्म कर देना-आकांक्षा श्रीवास्तव | HINDI KAVITA

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  किसी किताब को यूँ ही ख़त्म कर देना, बहुत असहज करता है मुझे, यह जानते हुए कि आज इसका अन्त है, जानते हुए कि कुछ ही पन्ने हैं , आज ही पढ़ लिए जाएंगे, . मैं रोक लेती हूँ स्वयं को, उस आख़िरी पन्ने तक पहुँचने से, किताब बंद करके रख देती हूँ किनारे, यह सोचकर कि अभी तो अन्त नहीं, अभी उन बादलों को घुमड़ने देना चाहिए, जो उस आख़िरी पन्ने पर पहुँचते ही बरस जाएंगे, कि अभी इस समय बारिश का होना या न होना, मैं निर्धारित कर सकती हूँ, . अभी उन बचे पन्नों को बासी होने से बचा सकती हूँ, बचा सकती हूँ उन्हें उस दर्द से, जो वे सहते हैं मोड़े जाने के समय, बचा सकती हूँ उन्हें उन निशानों से, जो उन पर जबरन लगा दिए जाते हैं, . यह जानते हुए कि मेरा उन्हें बचाना, कोई उपकार नहीं, न ही है इसमें मेरी कोई दयालुता, . क्योंकि वह आख़िरी पन्ना , मेरी ही उँगलियों तले दबकर दम तोड़ देगा और किताब रख दी जाएगी, एक लम्बे समयान्तराल के लिए, पुन: खुलने या न खुलने की अनिश्चितता के साथ। ~आकांक्षा श्रीवास्तव