कश्मीर-1990:-BY Arjun Manrol

 कश्मीर-1990

मेरे इतने टुकड़े किए गए
कि अब कोई हिस्सा ना बचा,
सदियां होने को आई हैं घर से दूर
अब सुनाने को बच्चों को
कोई किस्सा ना बचा..
.
वो आए थे उस रात, मेरे घर के नीचे
हाथों में बम, बंदूक, तलवारें खींचे,
'रलीव, गलीव, चलीव' के गूंजते नारो में
मैं कश्मीर को जलता देख सकता था शिकारों में
.
एक आखिरी बार मुझे मेरा घर दिखा दो
अरसों बीते जहां, वो जन्नत दिखा दो,
एक आखिरी बार उन चार दीवारों में कैद कर
आज़ाद कर दो मुझे,
गर लौटने को कश्मीर बर्बादी मानते हो,
तो बर्बाद कर दो मुझे..
.
मेरा ग़म बांटोगे?
बांट सकते हो?
जाओ, जा कर पूछ लो उस परिंदे से
जो लौट कर घर ना जा सका..
.
इस मुल्क से भी कम शिकायत नहीं है मेरी,
ना उस वक़्त कोई बोला था,
और आज भी सब मौन है
हम शायद ना बन सके किसी का वोट बैंक
तो फिर? कश्मीरी पंडित कौन है?
.
गिला तो कुछ तुझ से भी है
मेरे दिल-ए-बहार कश्मीर
तेरे साथ तो मनायी थी हर ईद मैंने
तो क्यूँ ना रोक सका तू मुझे जाने से
डल झील पर शिकारे साथ चलाए थे ना हमने
तो कहाँ था तू जब वो आए मेरा शिकार करने?
मैं आऊँगा वापस बाग करने वो वादियां
तू एक बार प्यार से बुला कर तो देख,
मेरा अक्स है झेलम में आज भी मौजूद
तू मुझे फिर से गले लगा कर तो देख.....
.
अभागा हूँ, बेघर हूँ, लज्जित हूँ
शरीर से घायल, अंत:करण से खंडित हूँ,
अपने देश में ही शरणार्थी, हाँ मैं कश्मीरी पंडित हूँ!

BY Arjun Manrol

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