यह 9 दिन:-Naziya Pathan // Hindi Kavita #writers

 यह 9 दिन

ये 9 दिन मुझे ही पूजते हैं
और पूरे साल अपनी गालियों में मुझे लाते हैं

हां तुम ठीक समझे ,
मैं स्त्री हूं
जिसके बिना पुरुष प्रधान समाज
का अस्तित्व नहीं है,

ये वोह समाज है
जहां मेरे बिना इनकी गालियां अधूरी है
ज़िन्दगी क्या खाक मुकम्मल होगी

रूप कई हैं मेरे
कभी में , शांत हूं, कभी सुशील, तो कभी अबला नारी
मत भूलो में ही लक्ष्मी हूं, में ही मां चंडी
तुम क्या व्याख्या करोगे मेरी???
जब अस्तित्व ही मुझसे है तुम्हारा

संभल जाओ एं पुरुष प्रधान समाज
की अंत अब दूर नहीं
हैरान गर में हू इस संसार में
तो खुश तुम भी नहीं

रोंध देते हो कभी अपने पैरो तले
सोचते नहीं की चलना मैने तुम्हे सिखाया है
कभी काट कर जुबान मेरी
खुद को मर्द समझते हो
सोचते नहीं की बोलना मैने तुम्हे सिखाया है

अपनी सारी समझदारी
मेरी ज़रा सी अदा पर खो बैठते हो
और मेरे सामने अपनी समझदारी दिखाते हो
सोचते नहीं की समझदार भी मैने तुम्हे बनाया है!

By Naziya Pathan

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