किताब:-आकांक्षा श्रीवास्तव

 किताब

किसी किताब को यूँ ही ख़त्म कर देना,
बहुत असहज करता है मुझे,
यह जानते हुए कि आज इसका अन्त है,
जानते हुए कि कुछ ही पन्ने हैं ,
आज ही पढ़ लिए जाएंगे,
.
मैं रोक लेती हूँ स्वयं को,
उस आख़िरी पन्ने तक पहुँचने से,
किताब बंद करके रख देती हूँ किनारे,
यह सोचकर कि अभी तो अन्त नहीं,
अभी उन बादलों को घुमड़ने देना चाहिए,
जो उस आख़िरी पन्ने पर पहुँचते ही बरस जाएंगे,
कि अभी इस समय बारिश का होना या न होना,
मैं निर्धारित कर सकती हूँ,
.
अभी उन बचे पन्नों को बासी होने से बचा सकती हूँ,
बचा सकती हूँ उन्हें उस दर्द से,
जो वे सहते हैं मोड़े जाने के समय,
बचा सकती हूँ उन्हें उन निशानों से,
जो उन पर जबरन लगा दिए जाते हैं,
.
यह जानते हुए कि मेरा उन्हें बचाना,
कोई उपकार नहीं,
न ही है इसमें मेरी कोई दयालुता,
.
क्योंकि वह आख़िरी पन्ना ,
मेरी ही उँगलियों तले दबकर दम तोड़ देगा
और किताब रख दी जाएगी,
एक लम्बे समयान्तराल के लिए,
पुन: खुलने या न खुलने की अनिश्चितता के साथ।

By आकांक्षा श्रीवास्तव

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