धुंधला अक्स:-By Monika Jauhari

 धुंधला अक्स

अनमनी सी, मैं, एक रोज़
शीशे में झाँक रही थी
कि लगा कोई धुँधली सी आकृति
मेरी ओर देख रही हो...
कोशिश की, जो गौर से देखने की ,
तो पता चला, आकृति धुंधली नहीं थी
खुद मेरी ही आँख भर आयी थी ।
आँसू सुखा, फिर देखा उसे
चेहरा देख लगा, बरसों पहले मिलें हों कहीं
जीवन के सारे बरस खंगाल डाले
पर उस चेहरे की पहचान न कर पाई ।
वो अब भी अकेली खड़ी थी
गुमसुम ,सिकुड़ी सिमटी सी,
मानो संसार की सारी कातरता,
उसी में सिमट आई हो...
कोई शब्द नहीं थे, फिर भी
अर्थ थे कि खुले जा रहे थे।
ये अँधेरा था कि, जितना घिर रहा था,
उतना ही उजाला हो रहा था...
तभी भीतर से, दबी सी,
किसी के खिलखिलाने की आवाज़ आई
कहीं कोई नज़र न आया,
पर अब ठीक सामने, शीशे में
अपने अक्स को पहचानने में,
मुझे ज़रा भी देर न लगी...
यह तो मेरा वही चेहरा था,
जिसे मैं,
पूरे बीस बरस पीछे छोड़ आयी थी !
मोनिका !

Thanks❣️

By Monika Jauhari

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