माँ रो रही हैं-By Pankaj

 माँ रो रही हैं


खिड़की में खड़े बच्चे को बिंदु जलती धूप सा सोख रही हैं, बार बार हातो मे भींच भींच के
शराब मिला पानी रगड़ रही है, कुछ तो कीटाणु धो रही हैं, कुछ गम पोछ रही हैं, बिंदु अपने जीवन मे अल्पविराम खोज रही हैं, कुछ अस्पताल मे लड़ रही हैं, कुछ घर पे बिछड़ रही हैं, वो स्थिरता से अस्थिर हो रही हैं, चल के आए बीमारों को बेचारी, थैलियों मे जकड़ के मोड़ रही हैं, बिंदु इस वतन के तिरंगे पे चमकते सूरज सा जड़ रही हैं, वो ख़ुदको खिलोना बनाके सब के हंजु पोछ रही हैं, बिंदु थकी हैं सड़क पे सो रही हैं, मगर ख़ुदको पुतला बनाके,
अपना फ़र्ज़ पूरा कर रही हैं, छोड़ रही हैं इस महामारी का डर जैसे पुराना कपड़ा हो,
वो सिमट सिमट के सफ़ेदी मे खुद खून सा लाल हो रही हैं,

वो पत्थर खा रही हैं, वो खून भी बहा रही हैं,
पर एक एक कदम वो सिर्फ और सिर्फ आगे बढ़ा रही हैं, बिंदु मरने के बाद भी अंजान सी हो रही हैं, सिपाही सी भले लड़ी थी पर सिर्फ इंसान सी लटक रही हैं, बिंदु थोड़ा दूर थोड़ा दूर रह रहीं हैं, घर कर्तव्य और मानसिकता मे वो ज़िम्मेदारी चुन रही हैं,
थोड़ा और समय लगेगा
बिंदु अभी लड़ रही हैं।
बात सफ़ेदी की या ख़ाकी की नहीं हैं,
ये जन बात सफ़ेदी की या ख़ाकी की नहीं हैं,
ये जनता हैं जो अब सितारें नहीं देखती।

By PANKAJ

FOLLOW ON INSTAGRAM:-PANKAJ

टिप्पणियां

Click On Beloww for RS.444

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

India Rejects LIC IPO LIC Strike

World Water Day 22, March. #waterday #worldwaterday #water

Scam 1992: The Harshad Mehta Story// Indian Story