Hindi Kavita | Written By:-prem_ki_pakhi (Neha Vats) #writers

 दिवाली पर हर साल आने वाली

नयी लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्ति
ले लेती है पुरानी मूर्ति की जगह
और पुरानी मूर्तियाँ रख उठती हैं
तुलसी के चौरे पर
या पीपल के चबूतरों पर,
जो विसर्जन की प्रतीक्षा में
क्षण-प्रतिक्षण क्षीण होती रहती हैं।

प्रेयसियाँ जिनका स्थान दे दिया जाता है
किसी और को और वे ठीक
इन्हीं मूर्तियों की तरह रख उठती हैं
किसी अनजान के आँगन के चौरों पर
जो जीवन भर कर्तव्य निर्वाहन
के बीच, धीरे-धीरे क्षीण होती जाती हैं।
कभी ना पूरी होने वाली एक प्रतीक्षा
मन के ताखों में रखी किसी
छोटी ढिभरी की तरह जलती रहती है।

Written By:-prem_ki_pakhi (Neha Vats)
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