मेरी किताबें:-Swapnil // Hindi Kavita #writers

 मेरी किताबें

छोटी कक्षाओं की किताबें भी रखी हो"—
मांँ ने खीझकर कहा...
मांँ मुझे प्रेम हुआ है — मैंने इठलाकर कहा
बाबा ने हमारा वार्तालाप सुनकर
कमरे में दस्तक दी… मैं सकपका गई
मांँ सुनो ना, तुम तो जानती हो
"मुझे कितना लगाव है किताबों से"
मैं इन्हें छोड़कर नहीं रह सकती —
मैंने प्रेम भाव से एक किताब हाथों में लेकर कहा,
मैंने नजर उठाकर देखा तो
बाबा मुझे एकटक देख रहे थे
मानो मुझसे कुछ कहना चाहते हों
मैं भी सुनना चाहती थी बाबा को
पर मुझे डर था पता नहीं क्या कहेंगे
बाबा उठकर चले गए बिना कुछ बोले
मांँ कमरे से रद्दी भरकर ले गई
मैंने किताबों की अलमारी देखी
वहांँ कुछ किताबें कम थीं
मानो मेरा हृदय निकाल लिया हो किसी ने
मैं दौड़कर मांँ के पास पहुंँची
मांँ के हाथ में कुछ नहीं था
बिल्कुल वैसे जैसे मुझमें हृदय नहीं हो
मांँ? किताबें? — मैंने मांँ से कहा
मांँ ने जाते हुए बोला बेच दी बाबा ने तुम्हारे
मांँ? क्यों? मैंने बोला था आपसे
मुझे प्रेम हुआ है...
 मैं प्रेम करती हूं
संसार की सभी किताबों से
"मैं नहीं रह सकती इनके बिना"
ये कहते हुए मैंने मांँ के पांव पकड़ लिए"ये तुम्हारे लिए नहीं है" — बाबा का स्वर सुनाई देता है...
पर बाबा? क्यों? — मैं रुदन स्वर में कहती हूं
"इसको बताओ इसको गृहस्थी संभालनी है किताबें नहीं" — बाबा मांँ से कहते हुए चले गए
मैं विलाप करते हुए वहीं गिर पड़ी
चेतना आने पर मैं अपने कमरे में गई
मैंने अपनी बची हुई किताबों को हृदय से लगा लिया
मेरे द्वारा पढ़ी जा चुकी किताबें
मेरे भीतर विलाप कर रही थीं
और मैं उन्हें थपकियांँ देकर सुलाने की कोशिश
जैसे एक मां अपने शिशु के साथ करती है...
मेरे अधर पर बैठा मौन ये देखकर
सिसक पड़ा और कहने लगा
आज तुम इन किताबों की मांँ हो
जिन्हें तुमने विदा कर दिया...
सच! ये किताबें किसी शिशु सी हैं...!

By Swapnil

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