बस तुम By Akanksha pandey || Bas Tum Ho || 'Tum' poems || Aur bus tum ||Hindi Kavita #writers

 बस तुम 


तुम,

हां तुम्हीं

तुमसे कुछ कहना चाहती हूं।

माना अनजान हूं

दिखती नादान हूं

कुछ ज्यादा कहने को नहीं है

कोई बड़ा फरमान नही है

बस इतना दोहराना है

जग में सबने जाना है

पीड़ा घटे बताने से

रात कटे बहाने से

लेकिन की थोड़ी कंजूसी

करके इतनी कानाफूसी

बात का बतंगड़ बनाया

ऐसा मायाजाल पिरोया


कि अब डरते हो तुम

कहने से अपने मन की

देने दुहाई तन्हा दिल की

करना सांझा अपना

बिसरा कोई दुख पुराना

किसी अपने का दूर जाना

सब रखते हो तकिए के नीचे

गठरी बांध कही कोने में

चूक से भी खोल न दे

जुबां कही बोल न दे

बिखर न जाए दुख बथेरे

आंसू शायद फिर न ठहरे


माना है ये खौफ बड़ा

चौखट छांके पिशाच खड़ा

पर एक कदम की दूरी है

सांझ के पीछे नूरी है

थाम ज़रा दिल तुम अपना

धीरे से आगे बढ़ना

हाथ मिलेंगे बहुतेरे

तुम किसी एक से

रिश्ता गढ़ना

थोड़ा तुम उसकी सुनना

कुछ थोड़ी अपनी कहना


हौले हौले बातों से

खुल जाएंगी गांठे मन की

हो जाएगा दिल हल्का

जब धार बहेगी लफ्जों की

हल्के हल्के कदमों से फिर

जाना तुम किवाड़ के पास

तुलु ए सेहर या चांदनी रात

दोनों देंगे तुम्हे कुछ आस

पिशाच थोड़ा घबराएगा

तुम पर भड़क, गुराएगा

फिर भी

By:- Akanksha pandey 

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