बीत गया हूं, मैं By दीक्षा झा || बीत गया बचपन || काव्य तरंग: साझा काव्य संग्रह || Doosari Shuruaat || Hindi Kavita #writers






 बीत गया हूं, मैं


तुम आज की पूछते हो।

ख्यालों और सवालों में हवा की ठंडी शीत हुआ..

आने वाले बरस,

ज़िम्मेदारी और संघर्ष होंगे..

जीवन तो चला गया..

अब, जीवित जाने कैसे-कौन होंगे..


मैं सोचता हूं,

मुझे इतना नहीं सोचना चाहिए..

पर, फिर कहता हूं,

बीत जाने से पहले कैसे मौन होंगे..


नहीं, सोचो!

तुम सोचो!

पर क़िताब खोल के,

या ध्यान(meditation) भर के..

बिना ओर-छोर के,

कैसे गौण होंगे..


यहां, कई मौसम ढल रहें हैं,

धीरे-धीरे..

अब, खूबसुरूती ढह जाएगी,

शायद, हर दिन के साथ ध्वस्त होकर..

इन सालों में कुछ नई ललितता हाथ आएगी..


डर है,

न आए तो..

डर है,

नवीन भोर..

रोशनी ही न लाए, तो..


पर, याद रखना,

बिना ओर-छोर के कैसे गौण होंगे..


कुछ संभाले रखना,

तभी शांति से एक दिन,

हम सब मौन होंगे..

By:-दीक्षा झा

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