'कविता' By अजय ⁣|| Hindwi: Hindi Kavita || हिंदी कविता Hindi Kavita || कविता कोश || Hindi Kavita#writers




'कविता'


 कोई पड़ा था नीचे⁣

नंगे पाँव⁣

धूल जमे हुए⁣

बिखरे केश⁣

जैसे महीनों से⁣

कंघी न की हो⁣

चिथड़े वस्त्र⁣

जो पैबंद से भी⁣

न जुड़ पाये⁣

झाँकता नंगा बदन⁣

जहाँ हड्डियों का ढाँचा⁣

अपारदर्शी नहीं था⁣

मैंने पास जाकर⁣

हिम्मत करके डरते हुए⁣

उसका सिर उठाया⁣

मैं चौंक गया,⁣

इतनी बुरी हालात में⁣

'कविता' पड़ी थी⁣

ओजपूर्ण, गौरवशाली⁣

शृंगार, विद्रोही, छायावादी⁣

सारे रस मुखमण्डल पर थे⁣

वह उठकर धीमे स्वर में बोली⁣

“मैं अमर हूँ!”⁣

और प्राण त्याग दिया...⁣

By- अजय ⁣

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