नदी By शिवम पाण्डेय || नदियों पर कवितायेँ || Poem The River - नदी हूँ मैं || नदी पर छोटी कविता ||Hindi Kavita#writers



नदी 

बहते नीर,

समेटे हुए हृदय में  पीर!

ये कहीं भी पहुच जाते हैं ,

पर कहीं कम तों कहीं ज्यादा !

 इनको रोकने की कोशिश खूब होती है,

बिना  इनके इरादों को जाने!

बिना इनके जरूरत को पहचाने !!


चलते ये तेढे मेढ़े रास्तों पर 

जो बहुत दुर्गम हैं 

पर ये डरते नहीं ,

बिना रुके अपने हालातों सें लड़ते ,

ये पहुच जाते हैं अपने लक्ष्य पर !

जहां उसके आने का उल्लास होता है!

उसके क्षमता पर विश्वास होता है॥

ये हमें लड़ना सिखाती है,

विपरीत परिस्थितियो से!

रास्ते में मिलने वाली विपत्तियों से!


कभी इनकी आवाज बहुत प्यारी लगती थी ,

जब ये कल-कल करके बहती हुई कानों को छुती थी !

पर वो समय अब कहां?

अब वो सुकून कहां?

है पर बहुत कम,

जहाँ नहीं पहुचते हम !

अब इनको समेटने की कोशिश किया जा रहा,

एक छोटे सें जगह पर !

जो इनको अच्छा नहीं लगता !

इनकी स्वतंत्रता  इनसे छीनी जा रही ,

इनके रास्ते रोके जा रहे,

जो इनको अपनों सें मिलने को रोकता है!

 इनको  दर्द के समुन्दर में धकेल देता ,

जिससे ये रोते हैं !

जिनके आंसू दिखायी नहीं देते ॥



 ये मानव  से लड़ती हैं ,

उनकी  जरूरत को अपना हथियार बनाकर !

कभी अपनी  अथाह  मौजूदगी से,

कभी बिना पहुचे दूर सें इन्हे चिढाकर!

दोनों परिस्थितियाँ गंभीर है!

अब मानव के हृदय में पीर है!!

इनका क्या ये फिर रास्ते  बना लेगी ,

writersअपने वजूद को  बढा देगी !

पर इँसान फसेगा,

अपने ही मायाजाल में !

जो बुना है उसने खुद के  स्वार्थों के लिए !!

By :-  शिवम पाण्डेय

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