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 वैश्या

बेचती है जिस्म अपना महज एक रोटी के लिए

नकाब नहीं पहना कभी अपना सच छुपाने के लिए

रौंदते हैं मर्द उसे बिस्तर पर

बस अपनी हवस मिटाने के लिए

सौ लांछन लगाए उस पर लेकिन किसी ने ना सोचा

एक मर्द भी तो आया था अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए

वो चीखती है, चिल्लाती है, छटपटाती है 

उससे नामर्दो की मर्दानगी और बढ़ सी जाती है

हैवान है वो जो नोचते है जिस्म बच्चियों का

एक वैश्या की रूह भी तब निकल सी जाती है

कहती है वो आ जाओ साहब मेरे पास पैसे भी ना

लूंगी मैं उन बच्चियों को छोड़ दो

जिनकी जिंदगी फिर थम सी जाती है

और जो देते नही थकते दिन में अपनी सफाई का सबूत

वहीं जाते है रात को उसी तवायफ के पास मिटाने अपनी भूख

जरा से सिक्कों में बिक जाती है

जरा से सिक्कों में खरिद जाती है

तब भी दुनिया उसे वैश्या बुलाती है..!!

By- Ishika Agrawal

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Comments

  1. बिलकुल सही
    बहुत अच्छे से इस कविता को चित्रित किया गया हैं
    So true🙏🙏

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